Wednesday, August 13, 2014

कुछ शेर

ज़िंदगी को तूफ़ान है इस तरह से घेरे
किनारे तो दीखते हैं पर घेहरे हैं अँधेरे

लेके एक  सहारा चल पड़े थे लेकिन
बीच भंवर वो छोड़कर चले हैं

टूटा है विश्वास अब ना करेंगे किसी पर
लेके यह ग़म 
हम दुनिया से चले हैं 

जानते हैं किश्तियों को मिलते नहीं किनारे
एक हम ही नहीं भंवर में और भी पड़े हैं

किसको दें आवाज़ जब शब्द ही ना रहे
इंतज़ार है उस घडी का जब साँस ही न रहे

Saturday, August 9, 2014

इज़्ज़त

किस लिए  हम  हैं इस क़दर बुज़दिल 
ज़ुल्म सहते हैं हम ख़ामोशी से 
एक मासूम  बेटी  की  इज़्ज़त 
सरे बाजार लूटी रहती है 

 और हम जो तमाशबीन बने 
इस तमाशे को देखा करते हैं
जिसकी इज़्ज़त लूटी सरे बाजार 
वह हमारी ही अपनी बेटी है 

और इज़्ज़त को लूटने वाला 
कितना बेफिक्र किस क़दर आज़ाद 
कितने बुज़दिल हैं लोग ऐ :"नीरा ”
कितना बेबस है देश का क़ानून  ?

कठपुतली

मोहे कठपुतली ना
बनावे कोई
हूँ भी उपरवाले
की संतान हूँ
मारे सीने मा भी
दिल होअय है
कठे फिर सारे मारे दिल
तोड़ने पर लागे हैं

जे कोई चावे
मने अपने तरीके से
नचावे है
जीहाँ चाहे ले जावे है
कोई मने वि तोः पूछो
मारा मन के चावे है
सारे रिश्ते में धोका
ही तोः होअय है.

पति नोः प्यार झूठा
वो भी बिन्द्नी बाहर
राखे है.
बचे वी तोः आपने
ना होए हैं
पुत्री तोः ब्याह कर
बिन्द संघ
आपने घर जावेगी
छोरा बिन्दनी का
हो जावे है

मारो तोः अनचाल
खाली ही राख्यो
भगवन ने
जीने वी अपनों बनायो
आपने ही वास्ते निकलो .
मै आब ना कोई के
हाथ की कठपुतली बनू
अब तोः मारो विश्वास
भी उठ गयो है
सब पर सो

Thursday, February 14, 2013

Khwaish


Khwaish

चाँद तारों में लपाट कर
बहारों में महक भर कर
मुहबत ने आज दिलबर
कैसा संदेशा भेजा है
पढ़ के चूम लेती हून
चूम के पढ़ लेती हून

राहों में पलकें बिछाकर
उमीदों के चिराज़ जलाकर
दिल में सनम के हलचल मचाकर
आँखों में कैसा ख्वाब भेजा है
देख के जाग जाती हून
जाग के देख लेती हून

आवाज़ की मीठी सरगम सजाकर
बोलों की मीठी धून बना कर
तन पैर मेरे जानम लिख कर
गीतों का कैसा पैगाम भेजा है
सुन के डूब जाती हून
डूब के सुनती जाती हून

महन्दी हाटों पैर लगवाकर
लाल जोड़ा पहन्वकर
हाट में चूडी, माथे बींद्या
आज एह कैसा शीनगर बैज़ा है
शर्मा के आईना देख लेती हून
आईना देख के शरमाती हून

आज क्या बात है किस के पास जाती हून
आज क्या बात है किसी को पास पाती हून 

Saturday, August 4, 2012

माँ

माँ कौन होती है क्या जानम जो देती है वो ही माँ होती है

क्या नाव महीने का गार्ब ही एक औरत कोमा कहलाता है
यशोदा भी तो मा थी कान्हा बेटा देवकी का था

वो तो मा कहलाई है फिर आज जो पालती है
मा क्युं नही कहलाती उसने भी तो गीले में सो

बचे को सूखे पर सुलाया है।खुद ना खा करअपने
लाड़ले को खिलाया है रात रात जाग कर नन्ही जान को

सुलाती है फिर भी वो मा क्युंनही कहलाती है
मंदिरों मे दुआ मांगती मस्जिद चादर चढ़ती है

चर्च जा, जाकर गुरु द्वारे सलामती की अरदास करती है
मा क्यूँ नही कहलाती है मा का दर्ज़ा भगवान है

जहाँ वो नही वहाँ मा है।सब ग्रंथों में यह बात बताई है।
मा क्यूँ नही कहलाती है फिर आज क्यूँ उसपर उंगली उठाई है

क्यूँ एक माके सामने परीक्षा आई है यह परीक्षा आई है
क्यूँ अपने बचे की माना वो na कहलाई है

Friday, May 28, 2010

दोस्त और दोस्ती के रंग

दोस्त और दोस्ती के रंग
बदलते देर नही लगती
जहां मटकती हैं आँखें
सादगी ठहर नही सकती

लचकती हो कमर जहां
भंवरे आ ही जाते हैं
चंचल शोख अदाओं के आगे
नाजुक छोरी ठहर नही सकती

दिखा के गोरा रंग तन का
लहराती हैं आँचल इस तरह
उड़ जाती हैं किसी कों भी ले संग
दोस्त वो तेरी कैसे हो सकती

खाओ कसम कि अब तुम
मिलाओगी न अपने अजीज से
छुपाकर रखना किवाड़ में
जहां दोस्त की चोरी हो नहीं सकती

Monday, December 7, 2009

चहरे पर चहरा

चहरे पे चहरा लगाकर झूटी प्रीत जताते हैं
किस तरह पास बुलाकर दिलबर दिलको तड़पते हैं .

दिखाते हैं ख्वाब हज़ारों सुनहरे हर दिन
लूटकर सपने, आँखोंसे खून टपकते हैं .

एक से दिल कहाँ भरता है हर्जाइयों का आजकल .
हमरी पीठ पीछे रंग रलियाँ मानते हैं .

वही फिर कभी मुडके मानने नहीं आते .
जो नाज़ उठा उठाके कभी रूठना सिखाते हैं .

अब हम भी सीख गए, तो हैरान नहीं होते .
पहले सोचते थे लोग आंसू कहाँ छिपाते हैं.

निरा किसकी कहानी पर ऐतबार करैं बेदर्दी.
केसे दिलफरेब अफसाने बनाकर सुनते हैं,

मासूमियत का नकाब चड़ा रखा है चहरेपर ,
केसे शिद्दतसे फरेबी प्यार की दुहाई फर्नाते हैं.