प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं ।
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥
माँगते खुशी के चंद पल जिनसे ।
वही ताउम्र गम का रिश्ता बनाते हैं ॥
पत्थर से लगी चोट सभी सहते हैं ।
अपनों से लगे घाव दर्द को बढ़ाते हैं॥
लगाई तोहमत जिन्होंने बेवफाई की ।
बिस्तर गैर का अब शान से सजाते हैं ॥
किस भरम से मेहरबानी करूँ या रब ।
रहकर दूर हमसे ऐहसान जो बताते हैं ॥
संगदिल तो थे ही खुदगर्ज भी बने ।
बेरुखी दिखाकर वो आज भी सताते हैं ॥
- नीरा
