Friday, August 7, 2009

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं ।
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥

माँगते खुशी के चंद पल जिनसे ।
वही ताउम्र गम का रिश्ता बनाते हैं ॥

पत्थर से लगी चोट सभी सहते हैं ।

अपनों से लगे घाव दर्द को बढ़ाते हैं॥

लगाई तोहमत जिन्होंने बेवफाई की ।
बिस्तर गैर का अब शान से सजाते हैं ॥

किस भरम से मेहरबानी करूँ या रब ।
रहकर दूर हमसे ऐहसान जो बताते हैं ॥

संगदिल तो थे ही खुदगर्ज भी बने ।
बेरुखी दिखाकर वो आज भी सताते हैं ॥

- नीरा

Thursday, July 30, 2009

गंगा तो बहती जाएगी

खुद में सब को समाएगी
करते हैं पाप जो दिन रात
उनके लिए भी मुक्ति लाएगी
गंगा तो बहती जायेगी

लूटते किस तरहां ज़िंदगियाँ
बैठ के गंगा किनारे फिर
जप्पते हैं राम नाम यह
करते हैं बलात्कार भी
इक दिन ज़िंद ताड़पाएगी
गंगा तो बहती जाएगी

चोरी डकैती इनके शौक़ हैं
हथियार से होली खेलते हैं
आतंक फैला रखा है यहाँ
देश को भी बैच देते हैं
इक दिन उफान ये लाएगी
गंगा तो बहती जाएगी

गंगा सब कुछ जानती है
पापी के लिए भी रो लेती है
दिल उसका बहुत महान है
सब के पाप धो देती हैं
वो दिल शिव-शिव कहलाएगी
गंगा तो बहती जाएगी

पाप या हो आस्तियाँ किसी
किहर चीज़ बहा ले जाती है
गंगा जल पावन है इतना
जिसे छूए उसे भा जाती है
हर दिल में जगह बनाएगी
गंगा तो बहती जाती ही

शिव केशसे उतार मा गंगा
भाव सागर में मिल जायेगी

Saturday, July 25, 2009

मेरा तो शाम से जी घबराए

मेरा तो शाम से जी घबराए
दीया जलाते ही मन मेरा होता है बेचैन
रोज़ सितारे गिन गिन कटती मुझ दुखिया कि रैन
लम्बी लम्बी रातें मूझ को पल भर नींद ना आये
मेरा तो शाम से जी घबराए

अफसानों में लिखा हुवा है तेरा मेरा प्यार
तुझ पे दिल और जान निछावर साजन सौ सौ बार
प्यार में जो मिट जाये वोही तो दीवाना कहलाये
मेरा तो शाम से जी घबराए

सावन का मौसम आया जब काली बदली छाई
पानी कि ठंडी बूंदों ने तन में आग लगाई
इक बिरहन ऐसे में केसे तनहा रात बिताये
मेरा तो शाम से जी घबराए

किस को दर्द बताऊं किस को दिल का हाल सुनाऊं
शर्म के मारे सखियों से भी दिल की बात छुपायुं
नाम जुबां पे तेरा आते आते बस रह जाये
मेरा तो शाम से जी घबराए

दूर रहूँ मैं तूझ से यह मेरा दस्तूर नहीं है
दूर है मुझ से ऐ साजन तो फिर भी दूर नहीं है
दिल में जो रहता है दिल उसको ही ढूंढ ना पाए
मेरा तो शाम से जी घबराए

Thursday, July 23, 2009

मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार

मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
बारिश जब आये तो मेरा और भी दिल घबराए
जुल्मी सावन मस्त हवा के झोंके ले कर आये
याद में तेरी दिल तडपे और नैना नीर बहाए
सजन मेरा तन, मन, धन सब तुझ पे जाए निसार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार

ज़रा सी आहट हो तो सोचूँ सजना लौट के आये
कब से घर के दरवाज़े पे बैठी आस लगाए
आजा ए बेदर्दी अब तो मुझ से रहा ना जाए
तेरे बीन इक बोझ सा लागे मुझ को यह संसार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार

रोज़ मेरी गलीयों में आये मुझ से आँख चुराए
जैसे सूखे खेत से बादल बिन बरसे उड़ जाए
जैसे इक प्यासे को कोई खाली जाम दिखाए
कैसे समझाऊँ मैं उसको प्यार नहीं व्योपार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार

कब तक ऐ बेदर्द रहेगा प्यार से तू अंजाना
एक झलक दिखादे जालिम दिल तेरा दीवाना
तेरे प्यार में जीना है और तुझ पे ही मर जाना
तेरे बिन जीवन का हर सच मेरे लिए बेकार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार

Friday, May 22, 2009

आखरी सफ़र


बेटे से माँ की दशा देखी न गयी
सामने ही उसके, रंगों की दुर्दशा हो गयी

कैसे गले से मंगलसूत्र छीना गया
हाथों से देखो चूड़ियाँ कैसे तोड़ी गईं

हँसता खेलता परिवार टूट सा गया
अर्थी जब बाबा की निकाली गयी

चीख रही आत्मा रो रहीं ऑंखें
रहे सपने अधूरे, जिंदगी ठहर गयी

चुननी हैं अस्थियाँ , जाना है गंगा,
आखरी सफ़र की यही रस्म रह गयी

- नीरा राजपाल

Thursday, May 14, 2009

जिंदगी उतरन बन गयी

चली थी किस्मत बनने
खुदा से लड़ कर अपने
हाथों की लकीरें लिखवाने
मिला कुछ ऐसा मुझको
जिंदगी वहीं ठहर गयी

ग़रीबी की ज़िल्लत मिली
रात-ओ-दिन -------------
मिला न नया कपड़ा कभी
ना ही मिली कोई गुड़िया
चादर पर लगाकर पैबंद
जमीन पर बिछी चटाई।
ज़िंदगी उतरन बन गयी

हुई छोटी तो क्या हुआ
उमर मेरी भी बढ़ती है
मिलते हैं भैया को नये कपड़े
मुझको देते उतरन हैं
कैसे क़ुदरत खेल खेल गयी

महलों के खवाब न देखे
सपनों की सेज सजाई नहीं
झुग्यों में रहकर मैंने
फिर हिम्मत जुटाई है
अब न ओढूंगी न ही
पहनूगी किसी की उतरन
कहानी नयी लिखी गयी

वक़्त से सीखा है मैंने
ख़ुद पर विश्वास है मुझको
पैबंद लगी चादर ओढ़के
चाहे न कोई जले दिया
पढूंगी चाहे जो भी हो
पौन्चूंगी अपने मुकाम पर
फेंकना उतार उतरन है।
ज़िंदगी ऐसी रच गयी

Saturday, April 11, 2009

होरी खेलन चले मुसदिलाल

लाल घाट पर रहते रहते, कहें मुसद्दी लाल
होरी में इस साल सभी देखो मेरा धमाल

गोरी की इस बार रंगों से , होगी मुलाकात ।
रंग देंगे तन -मन उसका , चेहरे की क्या बात

पग ठिठके पथ में उसके , हुआ नहीं विश्वास
देखा जब माँ के ही आगे, पड़ी पुत्र की लाश

उसकी भी तो होरी होगी , पर अग्नि के साथ
रोते देखा उसकी माँ को , मले वो अपने हाथ

पी ठंडाई कहीं पे , मचलें छैल -छबीले
डाल रहे रंग एक दूजे पर हरे-लाल-नीले-पीले

कहीं पर बच्चे कचरे में ढूँढ रहे थे रोटी
होली खेल नहीं पायें, इनकी किस्मत खोटी

देख के दुनिया का ये रंग कहें मुसद्दीलाल
आज तो मेरे भेजे में उमड़े कई सवाल

अब न ही रंग न ही करेंगे आँख मिचोली
यहाँ मुसद्दी के दिल की जलने लगी है होली