मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
बारिश जब आये तो मेरा और भी दिल घबराए
जुल्मी सावन मस्त हवा के झोंके ले कर आये
याद में तेरी दिल तडपे और नैना नीर बहाए
सजन मेरा तन, मन, धन सब तुझ पे जाए निसार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
ज़रा सी आहट हो तो सोचूँ सजना लौट के आये
कब से घर के दरवाज़े पे बैठी आस लगाए
आजा ए बेदर्दी अब तो मुझ से रहा ना जाए
तेरे बीन इक बोझ सा लागे मुझ को यह संसार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
रोज़ मेरी गलीयों में आये मुझ से आँख चुराए
जैसे सूखे खेत से बादल बिन बरसे उड़ जाए
जैसे इक प्यासे को कोई खाली जाम दिखाए
कैसे समझाऊँ मैं उसको प्यार नहीं व्योपार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
कब तक ऐ बेदर्द रहेगा प्यार से तू अंजाना
एक झलक दिखादे जालिम दिल तेरा दीवाना
तेरे प्यार में जीना है और तुझ पे ही मर जाना
तेरे बिन जीवन का हर सच मेरे लिए बेकार
मेरा तो सब कुछ तेरा प्यार
Thursday, July 23, 2009
Friday, May 22, 2009
आखरी सफ़र
बेटे से माँ की दशा देखी न गयी
सामने ही उसके, रंगों की दुर्दशा हो गयी
कैसे गले से मंगलसूत्र छीना गया
हाथों से देखो चूड़ियाँ कैसे तोड़ी गईं
हँसता खेलता परिवार टूट सा गया
अर्थी जब बाबा की निकाली गयी
चीख रही आत्मा रो रहीं ऑंखें
रहे सपने अधूरे, जिंदगी ठहर गयी
चुननी हैं अस्थियाँ , जाना है गंगा,
आखरी सफ़र की यही रस्म रह गयी
Thursday, May 14, 2009
जिंदगी उतरन बन गयी
चली थी किस्मत बनने
खुदा से लड़ कर अपने
हाथों की लकीरें लिखवाने
मिला कुछ ऐसा मुझको
जिंदगी वहीं ठहर गयी
ग़रीबी की ज़िल्लत मिली
रात-ओ-दिन -------------
मिला न नया कपड़ा कभी
ना ही मिली कोई गुड़िया
चादर पर लगाकर पैबंद
जमीन पर बिछी चटाई।
ज़िंदगी उतरन बन गयी
हुई छोटी तो क्या हुआ
उमर मेरी भी बढ़ती है
मिलते हैं भैया को नये कपड़े
मुझको देते उतरन हैं
कैसे क़ुदरत खेल खेल गयी
महलों के खवाब न देखे
सपनों की सेज सजाई नहीं
झुग्यों में रहकर मैंने
फिर हिम्मत जुटाई है
अब न ओढूंगी न ही
पहनूगी किसी की उतरन
कहानी नयी लिखी गयी
वक़्त से सीखा है मैंने
ख़ुद पर विश्वास है मुझको
पैबंद लगी चादर ओढ़के
चाहे न कोई जले दिया
पढूंगी चाहे जो भी हो
पौन्चूंगी अपने मुकाम पर
फेंकना उतार उतरन है।
ज़िंदगी ऐसी रच गयी
खुदा से लड़ कर अपने
हाथों की लकीरें लिखवाने
मिला कुछ ऐसा मुझको
जिंदगी वहीं ठहर गयी
ग़रीबी की ज़िल्लत मिली
रात-ओ-दिन -------------
मिला न नया कपड़ा कभी
ना ही मिली कोई गुड़िया
चादर पर लगाकर पैबंद
जमीन पर बिछी चटाई।
ज़िंदगी उतरन बन गयी
हुई छोटी तो क्या हुआ
उमर मेरी भी बढ़ती है
मिलते हैं भैया को नये कपड़े
मुझको देते उतरन हैं
कैसे क़ुदरत खेल खेल गयी
महलों के खवाब न देखे
सपनों की सेज सजाई नहीं
झुग्यों में रहकर मैंने
फिर हिम्मत जुटाई है
अब न ओढूंगी न ही
पहनूगी किसी की उतरन
कहानी नयी लिखी गयी
वक़्त से सीखा है मैंने
ख़ुद पर विश्वास है मुझको
पैबंद लगी चादर ओढ़के
चाहे न कोई जले दिया
पढूंगी चाहे जो भी हो
पौन्चूंगी अपने मुकाम पर
फेंकना उतार उतरन है।
ज़िंदगी ऐसी रच गयी
Saturday, April 11, 2009
होरी खेलन चले मुसदिलाल
लाल घाट पर रहते रहते, कहें मुसद्दी लाल
होरी में इस साल सभी देखो मेरा धमाल
गोरी की इस बार रंगों से , होगी मुलाकात ।
रंग देंगे तन -मन उसका , चेहरे की क्या बात
पग ठिठके पथ में उसके , हुआ नहीं विश्वास
देखा जब माँ के ही आगे, पड़ी पुत्र की लाश
उसकी भी तो होरी होगी , पर अग्नि के साथ
रोते देखा उसकी माँ को , मले वो अपने हाथ
पी ठंडाई कहीं पे , मचलें छैल -छबीले
डाल रहे रंग एक दूजे पर हरे-लाल-नीले-पीले
कहीं पर बच्चे कचरे में ढूँढ रहे थे रोटी
होली खेल नहीं पायें, इनकी किस्मत खोटी
देख के दुनिया का ये रंग कहें मुसद्दीलाल
आज तो मेरे भेजे में उमड़े कई सवाल
अब न ही रंग न ही करेंगे आँख मिचोली
यहाँ मुसद्दी के दिल की जलने लगी है होली
होरी में इस साल सभी देखो मेरा धमाल
गोरी की इस बार रंगों से , होगी मुलाकात ।
रंग देंगे तन -मन उसका , चेहरे की क्या बात
पग ठिठके पथ में उसके , हुआ नहीं विश्वास
देखा जब माँ के ही आगे, पड़ी पुत्र की लाश
उसकी भी तो होरी होगी , पर अग्नि के साथ
रोते देखा उसकी माँ को , मले वो अपने हाथ
पी ठंडाई कहीं पे , मचलें छैल -छबीले
डाल रहे रंग एक दूजे पर हरे-लाल-नीले-पीले
कहीं पर बच्चे कचरे में ढूँढ रहे थे रोटी
होली खेल नहीं पायें, इनकी किस्मत खोटी
देख के दुनिया का ये रंग कहें मुसद्दीलाल
आज तो मेरे भेजे में उमड़े कई सवाल
अब न ही रंग न ही करेंगे आँख मिचोली
यहाँ मुसद्दी के दिल की जलने लगी है होली
Tuesday, March 10, 2009
वो तो प्रेम दीवानी हो ली.
सतरंगा ये इन्द्रधनुष
आज उतर पृथ्वी पर आया
अपने हाथ बढा कर ले लो
रंग प्यार के सारे लाया
रंग-अबीर की बौछारों से
भीग गयीं ब्रिज की गोरी .
आज श्याम की पिचकारी से
कोई बचेगी ना छोरी
हरे, गुलाबी नीले रंग से,
छाई है हर और उमंग
राधा की आँखे बतलाएं ,
दिल में उठने लगी तरंग
दूर खडी है विरहन मीरा
लिए हाथ में इकतारा
बनकर जोगन सारा जीवन
कृष्ण कन्हैया पर वारा
कृष्ण भक्ति में मीरा ने फ़िर
पहनी केशरिया चोली
गीत प्रीतके गा-गाकर के
वो तो प्रेम दीवानी हो ली
आज उतर पृथ्वी पर आया
अपने हाथ बढा कर ले लो
रंग प्यार के सारे लाया
रंग-अबीर की बौछारों से
भीग गयीं ब्रिज की गोरी .
आज श्याम की पिचकारी से
कोई बचेगी ना छोरी
हरे, गुलाबी नीले रंग से,
छाई है हर और उमंग
राधा की आँखे बतलाएं ,
दिल में उठने लगी तरंग
दूर खडी है विरहन मीरा
लिए हाथ में इकतारा
बनकर जोगन सारा जीवन
कृष्ण कन्हैया पर वारा
कृष्ण भक्ति में मीरा ने फ़िर
पहनी केशरिया चोली
गीत प्रीतके गा-गाकर के
वो तो प्रेम दीवानी हो ली
Sunday, March 8, 2009
खैरात की जिंदगी नहीं चाहिए.
आज की नारी खुद में एक ढाल है
अपनी एक पहचान है।
गये ज़माने, जब गुलाम थी
वो हर बात इजाज़त पर निर्भर थी
सांस भी उधार में लेनी पढ़ती थी।
सब को खिला कर अन्नपूर्णा
अकेले खाने बैठती थी।
सबके सोने के बाद भी।
सब की सेवा करती थी
अब आजादी वो चाहती है।
खुद अपने नियम बनायगी
क़दम से कदम वो मिलाएगी,
राह से हर तूफ़ान हटाएगी
गर्व से अब वो जिए जायेगी
कमजोरी को ताकत बनाएगी
खैरात की जिंदगी नहीं चाहिए।
स्वाभिमान से वो सर उठाएगी
अब देखो कोई झूका ना पायेगा
शक्ति का प्रतिबिम्ब बनकर
वो जग में जगमगायेगी ।
अब वो सही रूप में सामने आएगी
अब सर उठायेगी
अब दुनिया झुकायेगी
- नीरा
अपनी एक पहचान है।
गये ज़माने, जब गुलाम थी
वो हर बात इजाज़त पर निर्भर थी
सांस भी उधार में लेनी पढ़ती थी।
सब को खिला कर अन्नपूर्णा
अकेले खाने बैठती थी।
सबके सोने के बाद भी।
सब की सेवा करती थी
अब आजादी वो चाहती है।
खुद अपने नियम बनायगी
क़दम से कदम वो मिलाएगी,
राह से हर तूफ़ान हटाएगी
गर्व से अब वो जिए जायेगी
कमजोरी को ताकत बनाएगी
खैरात की जिंदगी नहीं चाहिए।
स्वाभिमान से वो सर उठाएगी
अब देखो कोई झूका ना पायेगा
शक्ति का प्रतिबिम्ब बनकर
वो जग में जगमगायेगी ।
अब वो सही रूप में सामने आएगी
अब सर उठायेगी
अब दुनिया झुकायेगी
- नीराFriday, February 20, 2009
यह ज़ख्मो के सिलसिले जाने कब टूटेंगे
यह ज़ख्मो के सिलसिले जाने कब टूटेंगे
यह बदनास्सीबी के दाग जाने कब छूटेंगे
चाहे कोई भी लिबास बदल के आये ज़िन्दगी
दर्द के फफोले फिर भी जाने कब फूटेंगे
जिंदगी कम है खुशियों कि ए मेरे खुदा
तन्न्हई याद और सपने जाने फिर कब लूटेंगे
खुदको बांध किया, किवार ना खिड़की खोली
चाहत पर लगाया अंश, रिश्ते जाने कब रूठेंगे
दर्द के घावों ने किए हैं खिलवाड़ “निरा”
मलहम से लगाये पैबंद जाने कब सूखेंगे
यह बदनास्सीबी के दाग जाने कब छूटेंगे
चाहे कोई भी लिबास बदल के आये ज़िन्दगी
दर्द के फफोले फिर भी जाने कब फूटेंगे
जिंदगी कम है खुशियों कि ए मेरे खुदा
तन्न्हई याद और सपने जाने फिर कब लूटेंगे
खुदको बांध किया, किवार ना खिड़की खोली
चाहत पर लगाया अंश, रिश्ते जाने कब रूठेंगे
दर्द के घावों ने किए हैं खिलवाड़ “निरा”
मलहम से लगाये पैबंद जाने कब सूखेंगे
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