Friday, August 7, 2009

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं ।
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥

माँगते खुशी के चंद पल जिनसे ।
वही ताउम्र गम का रिश्ता बनाते हैं ॥

पत्थर से लगी चोट सभी सहते हैं ।

अपनों से लगे घाव दर्द को बढ़ाते हैं॥

लगाई तोहमत जिन्होंने बेवफाई की ।
बिस्तर गैर का अब शान से सजाते हैं ॥

किस भरम से मेहरबानी करूँ या रब ।
रहकर दूर हमसे ऐहसान जो बताते हैं ॥

संगदिल तो थे ही खुदगर्ज भी बने ।
बेरुखी दिखाकर वो आज भी सताते हैं ॥

- नीरा

6 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

neera ji , dard se bhari daastan aapne kah daali ji ... main kya kahun nishabd hoon ji .. aapke lekhan ko salaam ...

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

VIJAY TIWARI " KISLAY " said...

नीरा जी
आज के बदलते परिवेश को ध्यान में रख कर जो प्यार का घटिया , विकृत और स्तरहीन रूप हमें दिखाई देने लगा है, यहाँ पर अब प्रेम के मायने ही बदल गये हैं. प्यार को अब केवल शारीरिक सुख तक ही सीमित किया जा रहा है, जबकि प्रेम एक ऐसी परस्पर समर्पण प्रक्रिया का नाम है जिसमें दोनों पूरक की भूमिका का ही निर्वहन करते हैं, इसके आगे-पीछे किसी प्रकार के भ्रम का कोई स्थान नहीं होता आप ने इतने अच्छे अल्फाज़ों में ग़ज़ल को बयान किया है, हम एक बार पुनः आपकी अभिव्यक्ति के कायल हो गये.
- विजय

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

नीरा जी!

वन्दे मातरम.

व्यक्तिगत पीडा सृजन का श्रीगणेश करती है किनती समयजयी साहित्य का सृजन तब होता है जब व्यक्तिगत पीडा समष्टिगत बनकर अभिव्यक्त हो. काव्य की जिस विधा को अपनाएं उसके पिंगल तथा भाषा के व्याकरण को जितना आत्मसात करेंगी रचनाएँ श्रेष्ठ होती जाएँगी. आपमें प्रतिभा है, उसे तराशिये. शुभ कामनाएँ. 'दिव्य नर्मदा' से जुडें.

dineshkhanna said...

प्यार के बदले जख्म तो हमने भी खाया है
चोट खाकर अब ये समझ आया है
उनके लिए तो दिल लगाना एक खेल है
जिन्हें तू समझता अपना हमसाया है

इसीलिए कहता हूँ.....
अपनी मोहब्बत में उन्हें इस कदर बाँध दो
गर खुलने की कोशिश करें तो वो बिखर जाएँ.....

s.m. azhar said...

num neera ho aur main tumhara neer main bhi neer bhari gagri men samana chahta tha , jo shayad niyati ko manzoor nahi tha bina neer key neera waisi hi hai jaisey bin badal barsaat neer aur pani men kuch to anter rakho neera ji megh pani key barastey hain neer kay nahi neer to bas ek asha liye ankhon men umadtey ghumadtey hain badal kabhi nahi bantey hain
kya neer ki ek boond dukh key sagar ka ehsaas nahi dilati hai tumhey

s.m. azhar said...
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