दोस्त और दोस्ती के रंग
बदलते देर नही लगती
जहां मटकती हैं आँखें
सादगी ठहर नही सकती
लचकती हो कमर जहां
भंवरे आ ही जाते हैं
चंचल शोख अदाओं के आगे
नाजुक छोरी ठहर नही सकती
दिखा के गोरा रंग तन का
लहराती हैं आँचल इस तरह
उड़ जाती हैं किसी कों भी ले संग
दोस्त वो तेरी कैसे हो सकती
खाओ कसम कि अब तुम
मिलाओगी न अपने अजीज से
छुपाकर रखना किवाड़ में
जहां दोस्त की चोरी हो नहीं सकती
Friday, May 28, 2010
Monday, December 7, 2009
चहरे पर चहरा
चहरे पे चहरा लगाकर झूटी प्रीत जताते हैं
किस तरह पास बुलाकर दिलबर दिलको तड़पते हैं .
दिखाते हैं ख्वाब हज़ारों सुनहरे हर दिन
लूटकर सपने, आँखोंसे खून टपकते हैं .
एक से दिल कहाँ भरता है हर्जाइयों का आजकल .
हमरी पीठ पीछे रंग रलियाँ मानते हैं .
वही फिर कभी मुडके मानने नहीं आते .
जो नाज़ उठा उठाके कभी रूठना सिखाते हैं .
अब हम भी सीख गए, तो हैरान नहीं होते .
पहले सोचते थे लोग आंसू कहाँ छिपाते हैं.
निरा किसकी कहानी पर ऐतबार करैं बेदर्दी.
केसे दिलफरेब अफसाने बनाकर सुनते हैं,
मासूमियत का नकाब चड़ा रखा है चहरेपर ,
केसे शिद्दतसे फरेबी प्यार की दुहाई फर्नाते हैं.
किस तरह पास बुलाकर दिलबर दिलको तड़पते हैं .
दिखाते हैं ख्वाब हज़ारों सुनहरे हर दिन
लूटकर सपने, आँखोंसे खून टपकते हैं .
एक से दिल कहाँ भरता है हर्जाइयों का आजकल .
हमरी पीठ पीछे रंग रलियाँ मानते हैं .
वही फिर कभी मुडके मानने नहीं आते .
जो नाज़ उठा उठाके कभी रूठना सिखाते हैं .
अब हम भी सीख गए, तो हैरान नहीं होते .
पहले सोचते थे लोग आंसू कहाँ छिपाते हैं.
निरा किसकी कहानी पर ऐतबार करैं बेदर्दी.
केसे दिलफरेब अफसाने बनाकर सुनते हैं,
मासूमियत का नकाब चड़ा रखा है चहरेपर ,
केसे शिद्दतसे फरेबी प्यार की दुहाई फर्नाते हैं.
Tuesday, December 1, 2009
मिलता ना कोई सम्मान है
क्या कभी किसी ने सोचा है
क्या कभी किसी ने पूछा है
तुम्हारी भी कोई चाहत है
तुम्हारी भी कोई इच्छा है
ट्रेफिक सिग्नल पर खड़े
ताली बजा कर पैसे लें
जो ना करे तंग उनको
जी भर के वो दुआ दें.
आए जो कहीं दुल्हन
खबर उनको लग जाती है
आकर दूल्हे के घर वो
आशीर्वाद दे जाते हैं
बदले में मिलता क्या उनको
कुछ कपड़े कुछ रुपए बस.
देता ना कोई इज़्ज़त इनको
मिलता ना कोई सम्मान है
वो भी है इंसान हम से
है उनका भी अपना घर
कुछ कमी है तभी,
वो कहलाते " किन्नर"
क्या कभी किसी ने पूछा है
तुम्हारी भी कोई चाहत है
तुम्हारी भी कोई इच्छा है
ट्रेफिक सिग्नल पर खड़े
ताली बजा कर पैसे लें
जो ना करे तंग उनको
जी भर के वो दुआ दें.
आए जो कहीं दुल्हन
खबर उनको लग जाती है
आकर दूल्हे के घर वो
आशीर्वाद दे जाते हैं
बदले में मिलता क्या उनको
कुछ कपड़े कुछ रुपए बस.
देता ना कोई इज़्ज़त इनको
मिलता ना कोई सम्मान है
वो भी है इंसान हम से
है उनका भी अपना घर
कुछ कमी है तभी,
वो कहलाते " किन्नर"
Thursday, September 24, 2009
फरियाद कर रही हूँ
आँसू बहा बहा कर ,मैं याद कर रही हूँ ,
"नीरा" के नीर देखो ,फरियाद कर रही हूँ
आँखों मे हैं जुदाई के बेसुकून लम्हे,
आहों से अपने दिल को आबाद कर रही हूँ
मीठे पलों को खातों में क़ैद कर रही हूँ
भीगी आँखों से पढ़ पलकें नम कर रही हूँ
फासलों से दूर दिल में बसेरा कर रही हूँ
मुलाकात के आसरे हर सरहदद पर कर रही हूँ
मिल जाए सुकून बाँध जाऊं हर जनम
मंदिर सा दिल मुहब्बत से आबाद कर रही हूँ
"नीरा" के नीर देखो ,फरियाद कर रही हूँ
आँखों मे हैं जुदाई के बेसुकून लम्हे,
आहों से अपने दिल को आबाद कर रही हूँ
मीठे पलों को खातों में क़ैद कर रही हूँ
भीगी आँखों से पढ़ पलकें नम कर रही हूँ
फासलों से दूर दिल में बसेरा कर रही हूँ
मुलाकात के आसरे हर सरहदद पर कर रही हूँ
मिल जाए सुकून बाँध जाऊं हर जनम
मंदिर सा दिल मुहब्बत से आबाद कर रही हूँ
Sunday, September 20, 2009
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी
केसे बैठूं डोली में माँ
आएगी जब याद तेरी
यूँही आंसू बहायूंगी
तुझ बिन रह ना पाऊँगी
वो पल जो तेरे आंगन में
मैंने इतने दिन गुजारे हैं
वो दीवारें जिन पर मैंने
रंगों के निशान बनाये हैं
केसे उनको भूल पाऊँगी
पता है माँ मेरी गुडिया
आज भी संदूक में रखी है
क्या हुआ जो उसकी एक टांग छोटी है
केसे उसको छोर जाउंगी
आंगन में भिखरी हैं यादें
बुहार के भी ना समेट पाऊँगी
आएगी तेरी याद दिन, रात मुझको
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी
बाबुल कि भिलाख्ती आंखे
दिल मेरा चीर देती हैं
भाई के नन्हे हाथ मुझे
जाने से रोक लेते हैं
इनकी आँखों से निकले आंसूं
केसे मैं देख पाऊँगी
क्या बेटी तुझ पर बोझ है माँ
क्यूँ नहीं रह सख्ती तेरे साथ
भाई भी तोः लायेगा भाभी
जमाई को भी ले आ घर
माँ चल आ कुछ नया करें
आज नया इतहास रचें
नयी कुछ रौशनी जगाएं
बता माँ तू ही बता
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी
आएगी जब याद तेरी
यूँही आंसू बहायूंगी
तुझ बिन रह ना पाऊँगी
वो पल जो तेरे आंगन में
मैंने इतने दिन गुजारे हैं
वो दीवारें जिन पर मैंने
रंगों के निशान बनाये हैं
केसे उनको भूल पाऊँगी
पता है माँ मेरी गुडिया
आज भी संदूक में रखी है
क्या हुआ जो उसकी एक टांग छोटी है
केसे उसको छोर जाउंगी
आंगन में भिखरी हैं यादें
बुहार के भी ना समेट पाऊँगी
आएगी तेरी याद दिन, रात मुझको
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी
बाबुल कि भिलाख्ती आंखे
दिल मेरा चीर देती हैं
भाई के नन्हे हाथ मुझे
जाने से रोक लेते हैं
इनकी आँखों से निकले आंसूं
केसे मैं देख पाऊँगी
क्या बेटी तुझ पर बोझ है माँ
क्यूँ नहीं रह सख्ती तेरे साथ
भाई भी तोः लायेगा भाभी
जमाई को भी ले आ घर
माँ चल आ कुछ नया करें
आज नया इतहास रचें
नयी कुछ रौशनी जगाएं
बता माँ तू ही बता
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी
Sunday, August 23, 2009
औरत की क्या हस्ती है
औरत की क्या हस्ती है
चीज़ वोः कितनी सस्ती है
कहीं वोः दिल की रानी है
कहीं बस एक कहानी है
कितनी बेबस दिखती है
जब बाज़ार में बिकती है
कहीं वोः दुर्गा माता है
इस संसार की दाता है
कहीं वोः घर की दासी है
नादिया हो कर प्यासी है
सब के ताने सहती है
फिर भी वोः चुप रहती है
सरस्वती का अवतार है वोः
शिक्षा का भंडार है वोः
किस्मत उसपे हंसती है
जब शिक्षा को तरसती है
क्या क्या ज़ुल्म वोः सहती है
फिर भी हंसती रहती है
कहीं सजा यह पाती है
गर्ब में मारी जाती है
कहीं वोः माता काली है
कहीं वोः एक सवाली है
खाली हाथों आने पर
दान-दहेज़ ना लाने पर
ज़ुल्म यह धाया जाता है
उसको जलाया जाता है
नीर नयन से बरसे है वोः
मुस्कान को तरसे है
खुशियों को तरस्ती है
औरत की क्या हस्ती है
चीज़ वोः कितनी सस्ती है
कहीं वोः दिल की रानी है
कहीं बस एक कहानी है
कितनी बेबस दिखती है
जब बाज़ार में बिकती है
कहीं वोः दुर्गा माता है
इस संसार की दाता है
कहीं वोः घर की दासी है
नादिया हो कर प्यासी है
सब के ताने सहती है
फिर भी वोः चुप रहती है
सरस्वती का अवतार है वोः
शिक्षा का भंडार है वोः
किस्मत उसपे हंसती है
जब शिक्षा को तरसती है
क्या क्या ज़ुल्म वोः सहती है
फिर भी हंसती रहती है
कहीं सजा यह पाती है
गर्ब में मारी जाती है
कहीं वोः माता काली है
कहीं वोः एक सवाली है
खाली हाथों आने पर
दान-दहेज़ ना लाने पर
ज़ुल्म यह धाया जाता है
उसको जलाया जाता है
नीर नयन से बरसे है वोः
मुस्कान को तरसे है
खुशियों को तरस्ती है
औरत की क्या हस्ती है
Friday, August 7, 2009
प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं
प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं ।
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥
माँगते खुशी के चंद पल जिनसे ।
वही ताउम्र गम का रिश्ता बनाते हैं ॥
पत्थर से लगी चोट सभी सहते हैं ।
अपनों से लगे घाव दर्द को बढ़ाते हैं॥
लगाई तोहमत जिन्होंने बेवफाई की ।
बिस्तर गैर का अब शान से सजाते हैं ॥
किस भरम से मेहरबानी करूँ या रब ।
रहकर दूर हमसे ऐहसान जो बताते हैं ॥
संगदिल तो थे ही खुदगर्ज भी बने ।
बेरुखी दिखाकर वो आज भी सताते हैं ॥
- नीरा
Subscribe to:
Posts (Atom)


