Friday, May 28, 2010

दोस्त और दोस्ती के रंग

दोस्त और दोस्ती के रंग
बदलते देर नही लगती
जहां मटकती हैं आँखें
सादगी ठहर नही सकती

लचकती हो कमर जहां
भंवरे आ ही जाते हैं
चंचल शोख अदाओं के आगे
नाजुक छोरी ठहर नही सकती

दिखा के गोरा रंग तन का
लहराती हैं आँचल इस तरह
उड़ जाती हैं किसी कों भी ले संग
दोस्त वो तेरी कैसे हो सकती

खाओ कसम कि अब तुम
मिलाओगी न अपने अजीज से
छुपाकर रखना किवाड़ में
जहां दोस्त की चोरी हो नहीं सकती

Monday, December 7, 2009

चहरे पर चहरा

चहरे पे चहरा लगाकर झूटी प्रीत जताते हैं
किस तरह पास बुलाकर दिलबर दिलको तड़पते हैं .

दिखाते हैं ख्वाब हज़ारों सुनहरे हर दिन
लूटकर सपने, आँखोंसे खून टपकते हैं .

एक से दिल कहाँ भरता है हर्जाइयों का आजकल .
हमरी पीठ पीछे रंग रलियाँ मानते हैं .

वही फिर कभी मुडके मानने नहीं आते .
जो नाज़ उठा उठाके कभी रूठना सिखाते हैं .

अब हम भी सीख गए, तो हैरान नहीं होते .
पहले सोचते थे लोग आंसू कहाँ छिपाते हैं.

निरा किसकी कहानी पर ऐतबार करैं बेदर्दी.
केसे दिलफरेब अफसाने बनाकर सुनते हैं,

मासूमियत का नकाब चड़ा रखा है चहरेपर ,
केसे शिद्दतसे फरेबी प्यार की दुहाई फर्नाते हैं.

Tuesday, December 1, 2009

मिलता ना कोई सम्मान है

क्या कभी किसी ने सोचा है
क्या कभी किसी ने पूछा है
तुम्हारी भी कोई चाहत है
तुम्हारी भी कोई इच्छा है

ट्रेफिक सिग्नल पर खड़े
ताली बजा कर पैसे लें
जो ना करे तंग उनको
जी भर के वो दुआ दें.

आए जो कहीं दुल्हन
खबर उनको लग जाती है
आकर दूल्हे के घर वो
आशीर्वाद दे जाते हैं

बदले में मिलता क्या उनको
कुछ कपड़े कुछ रुपए बस.
देता ना कोई इज़्ज़त इनको
मिलता ना कोई सम्मान है

वो भी है इंसान हम से
है उनका भी अपना घर
कुछ कमी है तभी,
वो कहलाते " किन्नर"

Thursday, September 24, 2009

फरियाद कर रही हूँ

आँसू बहा बहा कर ,मैं याद कर रही हूँ ,
"नीरा" के नीर देखो ,फरियाद कर रही हूँ

आँखों मे हैं जुदाई के बेसुकून लम्हे,
आहों से अपने दिल को आबाद कर रही हूँ

मीठे पलों को खातों में क़ैद कर रही हूँ
भीगी आँखों से पढ़ पलकें नम कर रही हूँ

फासलों से दूर दिल में बसेरा कर रही हूँ
मुलाकात के आसरे हर सरहदद पर कर रही हूँ

मिल जाए सुकून बाँध जाऊं हर जनम
मंदिर सा दिल मुहब्बत से आबाद कर रही हूँ

Sunday, September 20, 2009

केसे तुझ बिन रह पाऊँगी

केसे बैठूं डोली में माँ
आएगी जब याद तेरी
यूँही आंसू बहायूंगी
तुझ बिन रह ना पाऊँगी

वो पल जो तेरे आंगन में
मैंने इतने दिन गुजारे हैं
वो दीवारें जिन पर मैंने
रंगों के निशान बनाये हैं
केसे उनको भूल पाऊँगी

पता है माँ मेरी गुडिया
आज भी संदूक में रखी है
क्या हुआ जो उसकी एक टांग छोटी है
केसे उसको छोर जाउंगी

आंगन में भिखरी हैं यादें
बुहार के भी ना समेट पाऊँगी
आएगी तेरी याद दिन, रात मुझको
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी

बाबुल कि भिलाख्ती आंखे
दिल मेरा चीर देती हैं
भाई के नन्हे हाथ मुझे
जाने से रोक लेते हैं
इनकी आँखों से निकले आंसूं
केसे मैं देख पाऊँगी

क्या बेटी तुझ पर बोझ है माँ
क्यूँ नहीं रह सख्ती तेरे साथ
भाई भी तोः लायेगा भाभी
जमाई को भी ले आ घर
माँ चल आ कुछ नया करें
आज नया इतहास रचें
नयी कुछ रौशनी जगाएं

बता माँ तू ही बता
केसे तुझ बिन रह पाऊँगी

Sunday, August 23, 2009

औरत की क्या हस्ती है

औरत की क्या हस्ती है
चीज़ वोः कितनी सस्ती है

कहीं वोः दिल की रानी है
कहीं बस एक कहानी है

कितनी बेबस दिखती है
जब बाज़ार में बिकती है

कहीं वोः दुर्गा माता है
इस संसार की दाता है

कहीं वोः घर की दासी है
नादिया हो कर प्यासी है

सब के ताने सहती है
फिर भी वोः चुप रहती है

सरस्वती का अवतार है वोः
शिक्षा का भंडार है वोः

किस्मत उसपे हंसती है
जब शिक्षा को तरसती है

क्या क्या ज़ुल्म वोः सहती है
फिर भी हंसती रहती है

कहीं सजा यह पाती है
गर्ब में मारी जाती है

कहीं वोः माता काली है
कहीं वोः एक सवाली है

खाली हाथों आने पर
दान-दहेज़ ना लाने पर

ज़ुल्म यह धाया जाता है
उसको जलाया जाता है

नीर नयन से बरसे है वोः
मुस्कान को तरसे है

खुशियों को तरस्ती है
औरत की क्या हस्ती है

Friday, August 7, 2009

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं

प्यार के बदले जो जुल्म ढाते हैं ।
तोड़कर दिल कैसे मुस्कराते हैं ॥

माँगते खुशी के चंद पल जिनसे ।
वही ताउम्र गम का रिश्ता बनाते हैं ॥

पत्थर से लगी चोट सभी सहते हैं ।

अपनों से लगे घाव दर्द को बढ़ाते हैं॥

लगाई तोहमत जिन्होंने बेवफाई की ।
बिस्तर गैर का अब शान से सजाते हैं ॥

किस भरम से मेहरबानी करूँ या रब ।
रहकर दूर हमसे ऐहसान जो बताते हैं ॥

संगदिल तो थे ही खुदगर्ज भी बने ।
बेरुखी दिखाकर वो आज भी सताते हैं ॥

- नीरा