Friday, May 28, 2010

दोस्त और दोस्ती के रंग

दोस्त और दोस्ती के रंग
बदलते देर नही लगती
जहां मटकती हैं आँखें
सादगी ठहर नही सकती

लचकती हो कमर जहां
भंवरे आ ही जाते हैं
चंचल शोख अदाओं के आगे
नाजुक छोरी ठहर नही सकती

दिखा के गोरा रंग तन का
लहराती हैं आँचल इस तरह
उड़ जाती हैं किसी कों भी ले संग
दोस्त वो तेरी कैसे हो सकती

खाओ कसम कि अब तुम
मिलाओगी न अपने अजीज से
छुपाकर रखना किवाड़ में
जहां दोस्त की चोरी हो नहीं सकती

14 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर ,,,मन खुश हो गया ...बड़ी सुन्दर रचना है ,,,और भी पढता हूँ ....

Udan Tashtari said...

नव युग!!

RAJNISH PARIHAR said...

बड़ी सुन्दर रचना है ........ दर्द को क्या शब्द दिए है आपने....

Shekhar Kumawat said...

बड़ी सुन्दर रचना है ........ दर्द को क्या शब्द दिए है आपने....

bahut khub

मनोज कुमार said...

सुन्दर रचना है .

"Nira" said...

rajender ji
aapka swagat hai mere blog par aapko rachna pasand aayi
dhanyawaad

"Nira" said...

sameer ji
bahut bahut shukriya

"Nira" said...

rajnish ji

aapki saharna ki shukrguzaar hoon

"Nira" said...

shekhar ji

aapko pasand aayi rachna
shukriya

"Nira" said...

shekhar ji

aapko pasand aayi rachna
shukriya

"Nira" said...

manoj ji

bahut bahut shukriya

संजय भास्कर said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर ,,,मन खुश हो गया ...बड़ी सुन्दर रचना है ,,,और भी पढता हूँ ....

नीरा said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर ,,,मन खुश हो गया ...बड़ी सुन्दर रचना है ,,,और भी पढता हूँ ....

sanjay ji
aapka swagat hain mere blog par, aapko pasand aayi rachna dilse abhari hoon.

विजय तिवारी " किसलय " said...

अच्छा लिखा है नीरा जी आपने
- विजय

दिखा के गोरा रंग तन का
लहराती हैं आँचल इस तरह
उड़ जाती हैं किसी कों भी ले संग
दोस्त वो तेरी कैसे हो सकती
हिंदी साहित्य संगम जबलपुर