Thursday, September 24, 2009

फरियाद कर रही हूँ

आँसू बहा बहा कर ,मैं याद कर रही हूँ ,
"नीरा" के नीर देखो ,फरियाद कर रही हूँ

आँखों मे हैं जुदाई के बेसुकून लम्हे,
आहों से अपने दिल को आबाद कर रही हूँ

मीठे पलों को खातों में क़ैद कर रही हूँ
भीगी आँखों से पढ़ पलकें नम कर रही हूँ

फासलों से दूर दिल में बसेरा कर रही हूँ
मुलाकात के आसरे हर सरहदद पर कर रही हूँ

मिल जाए सुकून बाँध जाऊं हर जनम
मंदिर सा दिल मुहब्बत से आबाद कर रही हूँ

4 comments:

मानव मेहता said...

नमस्ते नीरा जी, बहुत सुन्दर लिखा है आपने....शब्दों को बहुत अच्छे ढंग से पिरोया है...
बधाई इतनी सुन्दर रचना के लिए....

s.m. azhar said...

tumarey chitra ki ek ek rekha nikat sey pahchanta hun main , tumhara ek ek shabd abhi tak kya bhoola hun main , tum hi to ho meri meri zindagi ka ahem hissa ban gayi ho mujhey akela chod kar jo chali gayi ho shayad yadon men baskar rehna tumko pasand tha ,kya tumhey ek pal bhi bhoola hun main , aaj bhi tumhey yaad karkey main bahut roya yeh soch kar ki shayad kabhi tumhey meri bhi yaad aa hi jaaye aur tum samjh sako ki sacha pyar kya hota hai

kaviraj said...

नमस्ते ....
नीरा जी
आपकी कविता ''दिल के झख्म " मुझे बहोत अछी लगी
सच में आपने अपना दर्द लिख दिया है |मुझे विश्वास है, इससे भी बढ़िया आप लिखे ऐसी आशा सह आपका एक अनदेखा प्रशंसक |

nareshsingh said...

bahut acchi rachna